Saturday, 30 January 2016

इल्म-ए-दीन!

بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ

अल्लाह तआला के नाम से शुरू करता हूँ जो बहुत मेहरबान और रहम करने वाला है। सब तारीफ़ें सारे जहानों के पालने वाले के लिए हैं, इतनी तारीफ़ें जो उसकी नेअमतों के बराबर हों और दुरूदो सलाम हो उसके रसूल हज़रत मुहम्मद ﷺ पर। दुनिया और आख़िरत की भलाई हो उन लोगों के लिए जो अपनी ज़िंदगी को हज़रत मुहम्मद ﷺ और आपकी आल व असहाब की सुन्नतों से सँवारते हैं।

इस्लामी भाईयों व बहनों अल्लाह तआला के फ़ज़लो करम से हम मुसलमान हैं लेकिन क्या हमें यह मालूम है कि एक मुसलमान होने के नाते हमारी क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं? अल्लाह हमसे क्या चाहता है? अल्लामा इक़बाल कहते हैं।

#तुम_तो_सैयद_भी_हो_मिर्ज़ा_भी_हो_और_अफ़ग़ान_भी_हो।
#यूँ_तो_सब_कुछ_हो_बताओ_कि_मुसलमान_भी_हो।

यह शेर आजकल के माहौल के मुताबिक़ बिल्कुल सही है। हम अपने आपको मुसलमान तो कहते हैं और यह बताने में बहुत फ़ख़्र (गर्व) महसूस करते हैं कि मैं सैयद हूँ, मैं पठान हूँ, मैं शेख़ हूँ वग़ैरा-2 लेकिन इस्लाम की रुह हमारे अन्दर से ख़त्म होती जा रही है। आज हमारे अन्दर तरह-तरह की बुराईयाँ और ऐब पैदा होते जा रहे हैं। हमारे किरदार खोखले होते जा रहे हैं। हम झूठ, चोरी, धोखेबाज़ी, शराबनोशी, नशाख़ोरी, बेहयाई जैसी बुराईयों की दलदल में फँसते जा रहे हैं।

ज़रा ग़ौर से सोचिए कि अल्लाह तआला के हम पर कितने अहसान हैं।
सबसे पहला अहसान तो यह कि उसने हमें इंसान बनाया और अपनी सारी मख़लूक़ में सबसे बेहतर बनाया और अशरफ़ुल मख़लूक़ात कह कर पुकारा।दूसरा इससे भी बड़ा अहसान यह कि हमें एक ख़ुदा को मानने वाला और उसी की इबादत करने वाला बनाया।तीसरा सबसे बढ़कर अहसान और करम यह है कि अपने सबसे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ का उम्मती बनाया और सबसे बेहतरीन उम्मत क़रार दिया यानि वह उम्मत जिसमें शामिल होने की अंबिया ने भी दुआएं कीं।

इन नेअमतों के लिए हम उस रब का जितना भी शुक्र अदा करें कम है। हमें यह कभी नही भूलना चाहिए कि हमें एक दिन मरना है, क़ब्र में जाना है। जहाँ हमारे साथ कोई भी नही जाएगा। ये सब चीज़ें जिन से हम बहुत ज़्यादा मुहब्बत करते हैं जैसे माँ, बाप, औलाद, बीवी, रिश्तेदार, दोस्त, दौलत, इज़्ज़त, शोहरत, हुस्न, ताक़त सब यहीं रह जाएँगे। वहाँ हमारे साथ कोई जाएगा तो सिर्फ़ हमारे आमाल (कर्म)। आमाल अच्छे हुए तो क़ब्र में हमारा साथ देंगे, वहाँ की तकलीफ़, परेशानी और वहशत से हमें छुटकारा दिलाएँगे और अगर बुरे हुए तो न सिर्फ़ तकलीफ़ और परेशानी को बढ़ाएँगे बल्कि साँप बिच्छू बनकर सताएंगे।

क़यामत के बाद हमें हश्र के मैदान में इकट्ठा किया जाएगा जहाँ की गर्मी और वहशत का कोई बयान नहीं किया जा सकता। वहाँ सब लोग एक दूसरे को पहचानेंगे तो ज़रूर मगर कोई किसी की बात तक नहीं सुनेगा यहाँ तक कि अंबिया और रसूल भी किसी की मदद नहीं करेंगे। सबको अपनी - अपनी पड़ी होगी। उस वक़्त सिर्फ़ हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ लोगों की सिफ़ारिश के लिए आगे आएंगे और हिसाबो किताब का सिलसिला शुरू होगा। वहाँ भी हमारी रिहाई आमाल की वजह से ही होगी जिनके आमाल बेहतर हुए और अल्लाह का फ़ज़लो करम भी हो गया तो उन्हें जन्नत में भेज दिया जाएगा लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होंगे कि जिनको उनके बुरे आमाल की वजह से सज़ाएँ सुनाई जाएंगी, अल्लाह तआला हमें उससे महफ़ूज़ रखे। आप ख़ुद ही सोचिए दुनिया की आग से हमारी एक उंगली भी जल जाए तो बर्दाश्त नहीं कर पाते तो फिर दोज़ख़ की आग को कैसे बर्दाश्त करेंगे, बस हमें यही कोशिश करते रहना चाहिए कि हमारे आमाल बेहतर रहें और अल्लाह के ग़ज़ब से बचे रहें। लिहाज़ा अब हमें यह जानना चाहिए कि वह कौन से काम हैं जिन से उसका ग़ज़ब नाज़िल होता है और कौन से कामों से फ़ज़लो करम, यानि हमें दीन की जानकारी हासिल करना चाहिए जिससे हमारी दुनिया और आख़िरत बेहतर हो।

*इल्म-ए-दीन और उसकी ज़रूरत:-
दीन-ए-इस्लाम का रास्ता इल्म (Knowledge) की वादियों से होकर गुज़रता है। किसी भी मज़हब में इल्म की इतनी अहमियत नहीं बताई गई जितनी इस्लाम में। क़ुरआने पाक में लगभग 700 जगह पर इल्म के बारे में कुछ न कुछ ज़िक्र है।

सबसे ख़ास बात तो यह है कि क़ुरआने पाक का जो सबसे पहला लफ़्ज़ नाज़िल  हुआ वो "इक़रा" था जिसका मतलब है "पढ़िए"। अल्लाह तआला क़ुरआने पाक में फ़रमाता है-

قُلْ ہَلْ یَسْتَوِی الَّذِیۡنَ یَعْلَمُوۡنَ وَ الَّذِیۡنَ لَا یَعْلَمُوۡنَ
(आप कहिए कि इल्म वाले और वह लोग जो इल्म नहीं रखते कहीं बराबर होते हैं।)
(सूरह अज़ ज़ुमरआयत 9)

क़ुरआने पाक में ही एक और जगह फ़रमाया गया है-
یَرْفَعِ اللّٰہُ الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا مِنۡکُمْ ۙ وَ الَّذِیۡنَ اُوۡتُوا الْعِلْمَ دَرَجٰتٍ
(अल्लाह तआला तुम में से ईमान वालों के और उनके जिन को इल्म अता हुआ दर्जे बुलन्द (ऊँचे) करेगा)
(सूरह अलमुजादिला आयत 11)

क़ुरआने पाक की इन आयात से इल्म की अहमियत का अच्छी तरह अन्दाज़ा लगाया जा सकता है। बहुत सी अहादीस भी इल्म की अहमियत के बारे में हैं।

"जो इल्म हासिल करने के लिए सफ़र करे अल्लाह तआला उसे जन्नत के रास्ते पर चलाता है।
(मुस्लिम शरीफ़)

"जिस शख़्स को इस हालत में मौत आए कि वो इल्म को ज़िन्दा रखने के लिए इल्म हासिल कर रहा था तो जन्नत में उसके और नबियों के बीच सिर्फ़ एक दर्जे का फ़र्क़ होगा।
(दारमी)

"इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है।
(इब्ने माजाह)

इन अहादीस की रौशनी में हम कह सकते हैं कि इस्लाम में इल्म का दर्जा बहुत ऊँचा है यहाँ तक कि उसे हर मुसलमान के लिए ज़रूरी क़रार दिया गया है।

*इल्म की अहमियत के बारे में कुछ क़ौल:-
हज़रत अली रज़ि0 फ़रमाते हैं कि इल्म माल से बेहतर है क्योंकि इल्म तेरी हिफ़ाज़त करता है और तू माल की
।हज़रत मआज़ बिन जबल रज़ि0 फ़रमाते हैं कि इल्म नूर (रौशनी) है, इससे अंधेरा दूर होता है। इल्म ही से अल्लाह की इताअत (हुक्म मानना) और इबादत का हक़ अदा होता है। इस से ही हराम और हलाल का सही पता लगता है। ख़ुश क़िस्मत लोगों के दिल ही इल्म को क़ुबूल करते हैं, बदक़िस्मत इससे महरूम रहते हैं।
इमाम ग़िज़ाली रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि इल्म की वजह से ही इंसान जानवरों से बेहतर होता है। यह वह नूर है जिसकी रौशनी में हर चीज़ की हक़ीक़त को पहचाना जा सकता है।

इल्म के बारे में इतना जान लेने बाद अब हमारे लिए यह जानना ज़रूरी है कि वह कौन सा इल्म है जो ईमान वालों के दर्जे बुलन्द करता है और जिसे हासिल करना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है।

हज़रत मुहम्मद ﷺ फ़रमाते हैं कि- अल्लाह जिसके साथ भलाई चाहता है उसे दीन की समझ दे देता है और हिदायत दे देता है।
(बुख़ारी, मुस्लिम)

इस हदीसे पाक से यह साबित होता है कि वह दीन ही का इल्म है जिसकी वजह से अल्लाह तआला मुसलमान को भलाई अता करता है लेकिन यहाँ पर यह बात भी क़ाबिले ग़ौर है कि दीन का इल्म सिर्फ़ नमाज़, रोज़ा या और इबादतों का ही इल्म नहीं है बल्कि इसमें वह मामलात भी शामिल हैं जो एक मुसलमान को दुनिया में रह कर करने हैं क्योंकि क़ुरआन के मुताबिक़ दुनिया आख़िरत की खेती है, लिहाज़ा हमें इल्म से यह भी सीखना ज़रूरी है कि दुनिया के कौन से काम करना जाइज़ हैं और उनके करने का सही तरीक़ा क्या है।

*इल्म हासिल करने का अस्ल मक़सद:-
अल्लाह तआला को पहचानना, उसकी बड़ाई और अज़मत को अपने दिलो दिमाग़ में अच्छी तरह बसाना।ईमान के लिए ज़रूरी सभी अक़ाइद का जानना।दुनिया व आख़िरत के मामलात की जानकारी हासिल करना।बुरी आदतों से बचाना और अच्छे अख़लाक़ का रास्ता दिखाना है।

इसका फ़ायदा हमें सिर्फ़ इस दुनिया में ही नहीं बल्कि आख़िरत में भी मिलता है।

हज़रत मुहम्मद ﷺ फ़रमाते हैं कि- जब इब्ने आदम (इंसान) मर जाता है तो उसके अमल का रिश्ता कट जाता है मगर तीन चीज़ों से अलग नहीं होता, एक उस इल्म से जिस से दूसरों को फ़ायदा हो, दूसरा सदक़ए जारिया से, तीसरा नेक औलाद से जो उसके लिए ख़ैर की दुआ करे।
(मुस्लिम शरीफ़़)

लेकिन आजकल इल्म-ए-दीन सीखने का रुझान बिल्कुल ख़त्म हो गया है, हम सोचते हैं कि इल्म-ए-दीन हासिल करना तो सिर्फ़ उनके लिए ज़रूरी है जो मौलवी या मुफ़्ती बनना चाहते हैं, हम तो बस नमाज़ और थोड़ा बहुत क़ुरआने पाक सीख लें वही काफ़ी है जबकि आप ﷺ का तो फ़रमान है कि- जो तू जाकर इल्म का कोई बाब (Lesson) सीखे, ये सौ रकअत नमाज़ (नफ़िल) पढ़ने से बेहतर है।
(इब्ने माजाह)

यह बात भी ध्यान में रखनी ज़रूरी है कि आख़िरत में हिसाबो किताब के वक़्त दुनिया में की हुई किसी ग़लती का कोई बहाना क़ुबूल नहीं किया जाएगा। मिसाल के तौर पर अगर कोई शख़्स हैज़ (मासिक धर्म) की हालत में अपनी बीवी को तलाक़ दे और उसे यह न मालूम हो कि यह हराम है, या कोई ताजिर (Businessman) उस तरीक़े पर या किसी ऐसी चीज़ की तिजारत करे जो इस्लाम में हराम है, या कोई मुलाज़िम (Employee) अपना फ़र्ज़ (Duty) सही तरह से अंजाम न दे और अपनी कमाई को हराम बना ले और फिर आख़िरत में बहाना करे तो उसका कोई बहाना क़ुबूल नहीं किया जाएगा बल्कि उससे कहा जाएगा कि तुम्हें पहले ही बता दिया था कि इल्म हासिल करना फ़र्ज़ है। क्या यह मुमकिन है कि तुम्हें तैरना नहीं आता हो और नदी में छलांग लगाकर यह उम्मीद करो कि बच जाओगे। लिहाज़ा अगर हम आख़िरत की भलाई चाहते हैं और अल्लाह के ग़ज़ब से बचे रहना चाहते हैं तो इल्म-ए-दीन हासिल करके उसकी रौशनी में अपने सारे दुनियावी कामों को अंजाम दें।

#वमा_अलैयना_इल्लल_बलाग्

इल्म की अहमियत अहादीस की रोशनी में!

इल्म की अहमियत और फ़ज़ीलत के ताल्लुक से यू तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने क़ुरआन में कई आयतें नाज़िल की है. कुछ का तज़किरा हम इस पोस्ट में करते हैं:-

👉इल्म में बरकत के लिए बेहतरीन दुआ -
अल-क़ुरान: “व कुल रब्बी ज़िदनी इलमन” - [सूरह ताहा (२०) आयत ११४]
(तर्जुमा: ऐ नबी दुआ कीजिये अपने रब से की ऐ अल्लाह मेरे इल्म में इज़ाफ़ा कर!)
                            ये हुक्मी आयत है और अंदाज़ा लगाइये की नबी-ए-करम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को हुक्म आ रहा है की आप अपने रब से इल्म की बरकत के खातिर दुआ किजिये… जब उस ज़ात को हुक्म आ रहा है जिसे अल्लाह अपने ग़ैब का इल्म अता करता है तो बा दर्जे उलूला हमारे से यह आयात ज़्यादा ख़िताब कर रही है की तुम तो ज़्यादा हासिल करो ,…
तो गोया अल्लाह की ज़ात सरचश्मा है इल्म का! अल्लाह की ज़ात इल्म का ज़रिया है…
लिहाज़ा अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अपने बन्दों को दुआ सिखलाई की: ‘मांगो अपने रब से की वो तुम्हारे इल्म में इज़ाफ़ा कर दे.…’

👉क्या अहले इल्म और जाहिल बराबर हो सकते हैं ? –
इस ताल्लुक से अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान में एक जगह फ़रमाता है:
अल-क़ुरान: “हल यस्तविल लज़ीना या’लमूना वल्लज़ीना ला या’लमून” - [सूरह ज़ुमर (३९) आयात ९]
(तर्जुमा: ऐ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ! वो लोग जो इल्म रखते है और जो लोग इल्म नहीं रखते क्या दोनों बराबर हो सकते हैं? नहीं!
                      लिहाज़ा इल्मवालो के दर्जात है अल्लाह के पास! तो इल्म हासिल करने से इंसान को फ़ज़ीलत हासिल होती है उसके दर्जात बुलंद होते है. और क्यों ना हो? दुनिया में हम एक दूसरे की इज़्ज़त क्यों करते हैं?? चाहे दीनी हलको में हो या दुनियावी ?
# दुनियावी हलको में: टीचर है, प्रिंसिपल है, डॉक्टर है, वकील है
# और दीनी हलको में उस्ताद है, मुफ़्ती है, आलिम है, हाफिज है, क़ारी है
यक़ीनन ये इल्म ही तो है जिसकी बुनियाद पर इंसान को इज़्ज़त और रुतबा मिलता है दुनिया मे …
तो मालूम हुआ की इल्म कोई भी हो वो इज़्ज़त और मर्तबा लाता है.…
और अगर दुनियावी इल्म शरअई (दीनी) इल्म के साथ मिल जाए तो सोने पर सुहागा हो जाता है…

👉इल्म इंसान के दर्जात को बुलंद करता है –
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान में एक जगह फ़रमाता है:
अल-क़ुरान: ” या रफा अल्लाहु अल-लज़ीना अमानु मिनकुम व अल-लज़ीना उतु अल-इल्मा दरजातिन” - [सूरह (५८) मुजादिला: आयात ११]
(तर्जुमा: अल्लाह यक़ीनन उन लोगों को जो तुम में से ईमान लए और जिन्होंने इल्म हासिल किया उनके दर्जात बुलंद करके रहेगा)
                       तो इस आयात में भी पता चला की जो लोग ईमान लाये और फिर इल्म हासिल किया यह दोनों चीज़े वजह बनती हैं इंसान के दर्जात बुलंद होने की,
और वो सब जो ईमान लाये जो रसूलल्लाह के साथ रहकर इल्म-ए-दीन सीखा आज उनका मुक़ाम उनका अहतराम उनकी इज़्ज़त दीगर सहाबा के मुकाबले में मुमताज़ है, ऊँची है और वो ज़्यादा नाम लिए जाते हैं ,…
तो इस आयत से भी पता चला की ये इल्म ही है जो इंसान के दर्जात को बुलंद करता है…

👉इल्म हासिल करना किस पर फ़र्ज़ है? –
महफूम-ए-हदीस है की रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया:
“तालिब उल इल्म फ़रिज़न अत कुल्ली मुस्लिमीन” - (मिसकात सफा २४)
(तर्जुमा: “इल्म का हासिल करना तमाम मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है”)
                     गौर करने वाली बात है की यहाँ लफ्ज़ देखिये तलब है! जिसका माना होता है किसी चीज़ को हासिल करने की कोशिश करना गोया आप उसे हासिल न कर पाये फिर चाहे वो आपको ज़िंदगी के 9० वे साल को भी मिल जाए आप उस (इल्म की जुस्तजू ) में ज़रूर लगे रहेंगे ,…
यानी इल्म हासिल करने की कोई हद नहीं है फिर चाहे आप जब भी अपनी ज़िम्मेदारियों से फारिग हो जाओ इल्म के लिए अपने ज़ेहन हमेशा खुले रखें
# इंशा अल्लाह-उल-अज़ीज़ !!!
अल्लाह ताला हमे पढ़ने सुनने से ज़्यादा अमल करने की तौफ़ीक़ दे.…
फिर इंशा अल्लाह हर किस्म का जायज़ इल्म हमे अपने रब की तरफ रुजू करवाएगा …

Friday, 29 January 2016

लोकतन्त्र (जमहूरियत) को इस्लाम में पूरा स्थान है!

अतिवाद के दो मतलब होते हैं. मेरे हिसाब से इनमें से एक मतलब सही होता है और दूसरा मतलब गलत होता है. इस्लामिक अतिवाद का एक मतलब है धर्म की बुनियादी बातों के साथ टिके रहना या वफादार बने रहना. मौजूदा वक्त मजहबी आजादी का है. अगर कोई इंसान यह कहता है कि वह पूरी तरह से अपने मजहब के साथ वफादार बना रहेगा, तो उस पर सवाल उठाने की कोई वजह नहीं है. ऐसा इंसान केवल अपनी मजहबी आजादी के हक का इस्तेमाल कर रहा है. लेकिन अगर इस्लामिक अतिवाद को उसके दूसरे मायने में लिया जाए, यानी जबरदस्ती दूसरों पर इसे थोपने के अर्थ में तो यह गलत है. अगर कोई मुसलमान यह कहे कि वह अपने मजहब के मामले में दूसरों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा और अपने मजहब की शिक्षाओं को दूसरों पर जबरदस्ती थोपेगा, तो यह इस्लामिक अतिवाद न केवल इस्लाम की भावना, बल्कि तार्किकता के भी खिलाफ होगा.

इस्लामिक अतिवाद की इस दूसरी संकल्पना ने ही उस रूप को जन्म दिया है, जिसे आधुनिक समय में इस्लामिक आतंकवाद कहा जाता है. लेकिन सच्चाई यह है कि इस्लामिक आतंकवाद जैसी शब्दों की जुगलबंदी परस्पर विरोधी हैं. इस्लाम सहिष्णुता और शांति का धर्म है. इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद स0अ0व0 ने फरमाया-
‘मेरे हिसाब से जो मजहब है वह है दयालुता और सहिष्णुता का मजहब.’ (मुसनद अहमद)

विभिन्न मुस्लिम इलाकों में हम जो हिंसा और विद्रोह देख रहे हैं, वह सामान्य तरीके की हिंसा नहीं है. यह वैचारिक रूप से न्यायोचित ठहराने की कोशिश में की जा रही हिंसा का एक उदाहरण है.
इस्लाम के नाम पर हिंसा या आतंकवाद की जड़ें बीसवीं सदी के मुसलिम विचारकों तक पहुंचती हैं, जिन्होंने यह विचार दिया कि इस्लाम एक पूर्ण व्यवस्था है और राजनीतिक शक्ति इसका एक जरूरी हिस्सा है, क्योंकि इसके बगैर इस्लाम को एक संपूर्ण जीवन पद्धति के तौर पर लागू नहीं किया जा सकता. जो लोग इस्लाम की राजनीतिक व्याख्या से प्रभावित थे, उन्होंने इसे समाज में एक राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर लागू करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने देखा कि राजनीतिक पद तो पहले से किसी और समूह के कब्जे में है. ऐसे में उन्हें लगा कि इस्लामिक राज्य की स्थापना के लिए मौजूदा शासकों को पद से हटाना अनिवार्य है. इस तरह तत्कालीन राजनीतिक शक्तियों को सत्ता से हटाना समाज में इस्लामिक राजनीतिक व्यवस्था को स्थापित करने के लिए एक अनिवार्यता बन गया. इसके बाद जब पहले से राजनीतिक सत्ता में मौजूद लोगों ने पद त्यागने से इंकार किया, तब जो लोग राजनीतिक इस्लाम में विश्वास करते थे, उन्होंने पुराने शासकों को रास्ते से हटाने के लिए हिंसा और आतंक का सहारा लिया.
यह वही राजनीतिक इस्लाम की विचारधारा है जिसने मौजूदा वक्त के मुस्लिम युवाओं को आतंकवाद के प्रति आकर्षित किया है. ये लोग तब तक इस क्षेत्र में सक्रिय रहेंगे जब तक इस तरह की विचारधारा को गैर इस्लामी और पैगंबर के विचारों के खिलाफ कहकर खारिज न कर दिया जाए.

लोकतंत्र दरअसल शासन का वह तरीका है जिसमें लोगों के प्रतिनिधि ही समाज के सामाजिक-राजनीतिक कामकाज की जिम्मेदारी संभालते हैं. यह व्यवस्था एक प्राकृतिक व्यवस्था है. इस्लाम एक प्राकृतिक धर्म है और ऐसे में इस्लाम भी इस प्रकार की शासन व्यवस्था को स्वीकार करता है.

दरअसल मानव जीवन के दो अलग-अलग हिस्से हैं- व्यक्तिगत और सामाजिक. जहां तक व्यक्तिगत मामलों का ताल्लुक है, हर इंसान अपने हिसाब से किसी भी तरह की जीवन पद्धति अपनाने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन तब तक, जब तक इसकी वजह से समाज को कोई नुकसान न पहुंचे. इस मामले में किसी भी तरह की कोई सीमा नहीं है.

हालांकि, जब बात समाज की आती है, तब हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यह काफी सारे लोगों से मिलकर बनता है. यहां हर इंसान अपनी सोच के मुताबिक रहना चाहता है. इस तरह के मामले के लिए इस्लाम हमें एक काफी व्यावहारिक तरीका बताता है. इसके मुताबिक, सामाजिक मामलों में यह निर्णय करने का अधिकार समाज के पास है कि सामाजिक मामलों का प्रबंधन किस तरह किया जाए. कुरान में इस सूत्र को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है- ‘अमरुहुमशुराबायनाहुम’ (42:38) इसका मतलब है- ‘(जो लोग) अपने मामले आपसी विचार-विमर्श के जरिए निपटाते हैं.’ इस्लाम के मुताबिक, लोकतंत्र का यही सूत्र है. इसका मतलब यह है कि व्यक्तिगत स्तर पर हर इंसान अपनी पसंद के मुताबिक जिदगी जीने के लिए स्वतंत्र है. लेकिन जहां तक सामाजिक मामलों का सवाल है, इनको सामाजिक विचार-विमर्श के जरिए प्रबंधित किया जाएगा. यही लोकतंत्र का सच्चा अर्थ है और शासन के इस तरीके की इस्लाम वकालत करता है.

लोकतंत्र कोई धार्मिक संकल्पना नहीं है. दरअसल यह सामाजिक संकल्पना है. लोकतंत्र मूल रूप से एक धर्मनिरपेक्ष सूत्र है जिसका मतलब है धर्म के प्रति अहस्तक्षेप के सिद्धांत को स्वीकार करना. लोकतंत्र धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देता. धार्मिक मामले लोगों के व्यक्तिगत कार्यक्षेत्र में आते हैं. लोकतंत्र की व्यवस्था में धर्म को पूरी तरह से व्यक्ति पर छोड़ा गया है. लोकतंत्र केवल उन्हीं मामलों पर ध्यान देता है, जो समाज के सभी सदस्यों के साथ जुड़े हों. यह लोकतंत्र है और लोकतंत्र के इस रूप को इस्लाम स्वीकार करता है.

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां समाज के सभी वर्गों को स्वतंत्रता और अवसर समान रूप से मुहैया कराए गए हैं. विभिन्न क्षेत्रों में मुस्लिमों की बेहतर स्थिति मुस्लिम समुदाय के विकास के लिए मौजूद अवसरों की गवाही देती है. अगर कुछ दिक्कतें हैं, तो यह याद रखा जाना चाहिए कि समस्याएं हर समाज में होती हैं. ऐसा कोई भी समाज नहीं है जिसे सभी व्यक्तियों या व्यक्ति समूहों के लिए एक आदर्श समाज कहा जा सके. ऐसे में भारत में मुसलमानों को इस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए- ‘समस्याओं पर ध्यान न दो और अवसरों का लाभ उठाओ.’

केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में मुसलिम युवा घृणा फैलानेवाली सामग्री से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं. ऐसी सामग्री सोशल नेटवर्किंग माध्यमों में बड़ी मात्रा में उपलब्ध है. यह इस्लाम के बारे में गहरी जानकारी के अभाव की वजह से है. अगर अपने धर्म की रक्षा के लिए उन्हें प्रेरित करने के लिए भड़काऊ चित्र या आग लगाने वाली भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, तो वे भावनात्मक रूप से प्रेरित हो जाते हैं. उन्हें लगता है आतंकी संगठनों के साथ जुड़कर वे अपने मजहब की खिदमत कर सकते हैं. यह उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया मात्र है और इसकी वजह है उनकी अपने मजहब के बारे में जानकारी की कमी. यह दरअसल एक शांतिप्रिय धर्म है. मुस्लिम युवाओं के आतंकी संगठनों से जुड़ने की समस्या का हल केवल उन्हें शिक्षित करने और इस्लाम का शांतिप्रिय साहित्य उनके बीच बांटने से ही होगा.

हिंसा और आतंकवाद, जो हम मौजूदा वक्त में देखते हैं, वह वास्तव में इस्लाम से भटकाव का नतीजा है. आज जो बात जरूरी है, वह है मूल इस्लाम की ओर लौटना. हमें यह देखना होगा कि इस्लाम की पवित्र बातें, कुरान और पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाएं क्या बताती हैं. अगर हम इस्लाम की वास्तविक भावना को समझ लेंगे, तो धर्म के नाम पर जो खून खराबा हो रहा है, वह खत्म हो जाएगा.

भारतीय मुसलमानों को मौजूदा वक्त में शांति के महत्व को समझना चाहिए. कोई भी चीज, जो इस्लाम के साथ हिंसा को जोड़ती हो, उसकी निंदा की जानी चाहिए. मौजूदा परिस्थितियों में विकास के पीछे जो दो अहम कारक हैं, वे हैं शांति और स्वतंत्रता. भारत में मुसलमानों को ये दोनों ही उपलब्ध हैं. ऐसे में अपनी उन्नति और विकास के लिए उन्हें इन दोनों कारकों का हर संभव इस्तेमाल करना चाहिए.

इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर फर्ज़ है!

हम मुसलमान हैं,हमारा धर्म इस्लाम है,यह हमारे लिए बड़े गर्व की बात है कि अल्लाह तआला ने हमें मुस्लिम बनाया,यदि वह चाहता तो हमें किसी ग़ैर मुस्लिम परिवार में ही रहने देता,हम मूर्तियों के सामने सर टेकते होते, लेकिन हम पर रहम फ़रमाया,अपने सम्बन्ध में सही पहचान प्रदान की,वह दीन दिया जो दुनिया में सुख और आख़िरत में मुक्ति का ज़ामिन है….याद रखें! इस दीन के प्रति हमारी पहली जिम्मेदारी यह बनती है कि हम इसे सीखें, इसे जानें….
क्यों?…. इसलिए कि दीन का सीखना हर मुसलमान की जिम्मेदारी है. हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इरशाद मुबारक है:
  طَلَبُ العِلْمِ فَرِيْضَةٌ عَلَىْ كُلِّ مُسْلِمٍ    )رواه ابن ماجه 224 ) و صححه الألباني

“इल्म का सीखना हर मुसलमान पर अनिवार्य है”. (इब्ने माजा 224)

ज्ञान क्या है?
अज्ञानता का विपरीत शब्द ज्ञान है, और किसी जाहिल को यह पसनद नहीं होता कि उसे जाहिल कहा जाए, इसी से आप इल्म के महत्व का अनुमान लगा सकते हैं. अल्लाह का एक गुण “अल-अलीम” है, अर्थात् बहुत अधिक जानने वाला, आदम अलैहिस्सलाम को फरिश्तों पर प्रधानता इल्म के आधार पर दी गई थी, कुरआन में सबसे पहली आयत जो अवतरित हुई उसकी शुरुआत إقرأ “इक़रा” से हो रही है. इस में पढ़ने का आदेश दिया जा रहा है और विदित है कि “पढ़ना” ज्ञान की कुंजी है।

क़ुरआन में वह आयतें जो बुद्धि, ज्ञान तथा सोचने और विचार करने से सम्बन्धित हैं अनुमानतः एक हज़ार की संख्या तक पहुंचती हैं। और विभिन्न स्थानों पर अल्लाह ने ज्ञान के महत्व को स्पष्ट किया है, जैसा कि अल्लाह ने फ़रमायाः
  قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ ۗ إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُولُو الْأَلْبَابِ   (سورة الزمر 9)

कहो, “क्या वे लोग जो जानते है और वे लोग जो नहीं जानते दोनों समान होंगे? शिक्षा तो बुद्धि और समझ वाले ही ग्रहण करते है।” (सूरः अल-ज़ुमर आयत 9)

दूसरे स्थान पर अल्लाह ने ज्ञान वालों का महत्व बयान करते हुए फ़रमायाः
يَرْفَعِ اللَّـهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَات   (سورة المجادلة 11 )  

तुममें से जो लोग ईमान लाए है और उन्हें ज्ञान प्रदान किया गया है, अल्लाह उनके दरजों को उच्चता प्रदान करेगा। (सूरः अल-मुजादलः आयत11)

यह ज्ञान है जिसे प्राप्त करने के लिए एक व्यक्ति  जब निकलता है तो उसके लिए स्वर्ग का पथ सरल कर दिया जाता है, फ़रिश्ते उसके रास्ते में अपना पर बिछाते हैं, तालिबे इल्म के लिए धरती और आकाश की प्रत्येक वस्तुयें यहां तक कि मछलियाँ भी समुद्र के पेट में दुआ करती हैं. आलिम को आबिद पर ऐसी प्रधानता प्राप्त है जैसे 14वीं रात के चाँद को सितारों पर प्रधानता हासिल है। ( तिर्मज़ी 2682 )

ज़रा विचार करें कि इस से बढ़ कर सौभाग्य और क्या होगा कि हमारे लिए फ़रिश्ते जो नूरानी प्राणी हैं अपना पर बिछायें और समुद्र की मछलियां भी दुआ करें।

इल्म के इसी महत्व के कारण अल्लाह तआला ने अपने नबी को आदेश दिया कि इस में वृद्धि की दुआ करते रहें:

  وَقُل رَّبِّ زِدْنِي عِلْمًا   (سورة طه 114)  

और कहो, “मेरे रब, मुझे ज्ञान में अभिवृद्धि प्रदान कर।” (सूरः ताहा आयत114)

इस्लाम अमल से पहले ज्ञान प्राप्त करने का आदेश देता है, इमाम बुखारी रह0 अपनी सहीह में बाब बांधते हैः
باب العلم قبل القول والعمل

कथनी और करनी से पूर्व ज्ञान प्राप्त करने का बाब।
और इसकी तशरूह में यह आयत प्रस्तुत करते हैं:
فَاعْلَمْ أَنَّهُ لَا إِلَـٰهَ إِلَّا اللَّـهُ  (سورة محمد 19)

“अतः जान रखों कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं।” (सूरः मुहम्मद आयत 19)

इस आयत में अल्लाह ने इस्लाम में प्रवेश करने से पहले कलिमा तय्यबा को जानने का आदेश दिया है, पता यह चला कि एक मुसलमान जाहिल नहीं हो सकता. पहले उसे लाइलाह इल्लल्लाह शब्द को जानने की जरूरत पड़ती है, फिर वह मुसलमान बनता  है।
               अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक युवक को देखा जो काम के समय इबादत कर रहा था तो आपने उस से पूछाः तेरे लिए खान-पान की व्यवस्था कौन करता है? उसने कहाः मेरा भाई, आपने फ़रमायाः तेरा भाई तुझ से अधिक इबादत करने वाला है। जब कि एक दूसरी हदीस में आता है कि अल्लाह के रसूल के ज़माने में दो भाई थे जिन में से एक कमाता था और दूसरा इल्म सीखने में लगा रहता था, एक दिन कमाने वाले ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सेवा में उपस्थित हो कर अपने भाई के सम्बन्ध में शिकायत की तो आपने फ़रमायाः لعلك ترزق به शायद तुझे उसी के कारण जीविका दी जा रही है।
                 एक व्यक्ति सम्पत्ति एकत्र करने में दिन रात एक कर देता है और आने के बाद  उसकी सुरक्षा और निगरानी में अपना समय लगाता है हालांकि वह खर्च करने से समाप्त भी होती है जब कि इल्म वह सम्पत्ति है जो इल्म वाले की सुरक्षा और निगरानी करती है और कभी समाप्त नहीं होती बल्कि जितना ख़र्च किया जाये उतना ही इसमें बढ़ोतरी होती है, हज़रत अली रज़ि. ने फ़रमायाः
يا بني العلم خير من المال، لأن العلم يحرسك، وأنت تحرس المال، والمال تنقصه النفقة، والعلم يزكو على الإنفاق

“ऐ बेटे ! ज्ञान माल से उत्तम है, क्योंकि ज्ञान तेरी निगरानी करता है और तुम माल की निगरानी करते हो, माल खर्च करने से कम होता है जब कि ज्ञान खर्ज करने से बढ़ता है।”

इल्म सीखने का यही महत्व था कि इस्लामी विद्वानों ने इल्म सीखने और इसके प्राप्त करने के लिए अपनी पूरी कोशिशें सर्फ़ कर दीं, इस्लामी विद्वानों ने जिस प्रकार इस रास्ते में परिश्रम किया  दुनिया के इतिहास में इसका कोई उदाहरण नहीं मिलता। आज इस्लामिक पुस्तकालयों में इस्लामी किताबों का जो भंडार पाया जाता है जिन्हें देख कर इंसान दंग रह जाता है, यह उन्हीं विद्वानो के प्रयास का परिणाम है.

इल्म सीखने के रास्ते में बहानेः
कुछ लोग दीन सीखने के रास्ते में विभिन्न प्रकार के बहाने बनाते हैं, उमर ज़्यादा होने का बहाना, समय न मिलने का बहाना, काम का बहाना आदि…हांलाकि इन बहानों की कोई हैसियत नहीं है, इल्म सीखने में लज्जा की क्या बात है, चाहे हमारी उम्र कितनी भी हो गई हो, एक व्यक्ति साठ या सत्तर वर्ष का क्यों न हो चुका हो उसके लिए ज्ञान का द्वार खुला हुआ है और इल्म प्राप्त करने के माध्यम अति सरल हैं, आज इल्म के रास्ते में कोई रुकावट नहीं रही, हम जानते हैं कि कितने सहाबा जब इस्लाम लाये तो उनमें  कुछ की आयु साठ सत्तर वर्ष की थी फ़िर भी उन्हों ने इल्म सीखा, और इसके लिए समय निकाला, उसी प्रकार हर युग में जिन लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया उन्हों ने इस्लाम को सीखा। कोई जरूरी नहीं है कि आदमी ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्वयं को पूरे तौर पर फ़ारिग कर ले, काम भी कर सकता है, और इधर छात्र भी बन सकता है, रिवायत में यहां तक आता है कि हज़रत उमर रज़ि. ने अपने एक पड़ोसी के साथ यह मामला तै कर लिया था कि एक दिन वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सेवा में उपस्थित हों और दूसरे दिन  हम उपस्थित हों फ़िर ज्ञान का आदान प्रदान हो जाए, इस प्रकार वह काम भी कर लेते थे और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मज्लिस से भी वंचित न रह पाते थे।
         और यह कहना बिल्कुल गलत है कि हमारे पास समय नहीं है, यदि हम दीन का ज्ञान प्राप्त करने के लिए टाईम नहीं निकाल सकते तो हमारे जीवन का उद्देश्य ही जाता रहा। और हाँ! समय निश्चित निकलेगा बस टाईम की प्लानिंग करने की ज़रूरत है.

इल्म सीखने के शिष्टाचारः
जब हम इल्म सीखने पर समहमत हो जाते हैं तो इसके कुछ शिष्टाचार हैं जिनका पालन करना विधार्थी के लिए अति आवश्यक हैः

1-सीखते समये दिल हाज़िर हो कितने लोग इल्म की मज्लिसों में उपस्थित तो होते हैं परन्तु उनका दिल इधर उधर भटकता रहता है, विदित है कि ऐसे लोग इल्म की सभा से कुछ भी लाभ नहीं उठा सकते। इस लिए इल्म की सभा में दिल का उपस्थित होना ज़रूरी है।

2-सीखने की इच्छा पाई जाती हो एक व्यक्ति में सीखने और ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा पाई जानी चाहिए, वह सीखने का इच्छुक हो, उसके दिल में सदैव सीखने की तड़प पाई जाती हो।

3-इल्म सीखने के लिए समय निकालता हो, कितने लोग अपने मित्रों के साथ, इन्टर्नेट पर अपना बहुमूल्य समय नष्ट कर देते हैं, कितने दुनिया कमाने में अपना पूरा समय लगाते हैं, कितने मनोरंजन में अपना बहुत सारा समय बर्बाद करते हैं, लेकिन जब इल्म सीखने की बारी आती है तो कहते हैं कि हमारे पास समय नहीं विदित है कि ऐसे लोग ज्ञान में वृद्धि नहीं ला सकते, हर व्यक्ति को इल्म सीखने के लिए दिन या रात में कुछ घंटे अवश्य निकालना चाहिए।

4-इल्म हासिल करने के लिए धैर्य और सहनशीलता से काम लेना होगा, दिल को मनाना होगा, इच्छाओं को मारना होगा कि प्राकृतिक रूप में मानव के अन्दर अपनी इच्छाओं के पीछे भागने की भावना पाई जाती है लेकिन उसे लगाम कस्ते ही उसका स्वभाव उसके अधीन हो जाता है।

5-इल्म सीखने का कर्म निरंतर जारी रखना बिना नाग़ाह किये हमेशा ज्ञान की प्राप्ती में लगे रहने वालों को हर युग में सफलता मिली है, जो कुछ इल्म सीखने से एक समय के बाद कट जाते हैं उनका इल्म सीमित हो जाता है और धीरे धीरे वह पतन की ओर चले जाते है।

6-भारत के एक बड़े विचारक और विद्वान मौलाना अबुल-हसन अली नदवी ने एक बार इस्लामिक विश्वविद्यालय मदीना, सऊदी अरब के विशाल हाल में विभिन्न भाषाओं के विधार्थियों को अरबी भाषा में सम्बोधित करते हुए कहा थाः:-
“प्यारे भाइयो! मैं अपने क्लास में एक औसत दरजे का विधार्थी था, मेरे क्लास में मुझ से ऊंचा नंबर पाने वाले साथी आज देखाई नहीं देते, न जाने आकाश ने उन्हें उचक लिया या धरती ने निगल लिया। जबकि आपका भाई आपके समक्ष अपनी भावनायें प्रकट करने की साहस कर पा रहा है, कारण यही है कि मैंने अपने सीखने के कर्म को निरंतर जारी रखा।” 

                ज्ञान को दीनी और दुनियावी दो भागों में बांटना इस्लाम की दृष्टि में सही नहीं है कि सारा ज्ञान अल्लाह का प्रदान किया हुआ है और एक मुस्लिम को दोनों की समान रूप में आवश्यकता है। हां यह बात बिल्कुल सही है कि व्यवसाय से जुड़े ज्ञान का सम्बन्ध दुनिया से होता है परन्तु इस्लाम दुनिया से एक मुस्लिम को काटता नहीं अपितु जोड़ता है और धरती की शोभा को बढ़ाने में भाग लेने का आदेश देता है और विदित है कि इस धरती पर शासन हमेशा ज्ञान वालों ने ही किया है, और आज भी ज्ञान वाले ही कर रहे हैं, एक जाहिल का वेतन चाहे वह कितना भी परिश्रम कर ले 7 हज़ार से अधिक नहीं होता जब कि एक पढ़ा लिखा व्यक्ति 2 लाख तक प्रति महीना वेतन प्राप्त करता है, इस प्रकार उसका System Of Life और जीने का ढ़ंग ऊंचा और प्रगतीशील होता है!

आइए हम अल्लाह से दुआ करते हैं:-
رَّبِّ زِدْنِي عِلْمًا 
“मेरे रब, मुझे ज्ञान में अभिवृद्धि प्रदान कर।”

उसी प्रकार यह दुआ भी करेः-
اللّهمّ انفعني بما علّمتني، وعلّمني ما ينفعني، وزدني علما،   (رواه الترمذي  3599)
ऐ अल्लाह मुझे तूने जो इल्म दिया है उस से हमें फ़ायदा पहुंचा, और वह इल्म दे जिस से मुझे फ़ायदा पहुंच सके, और मेरे इल्म में अभिवृद्धि प्रदान कर।।

اللّهمّ إنّي أعوذ بك من علم لا ينفع، ومن دعاء لا يسمع، ومن قلب لا يخشع، ومن نفس لا تشبع  (النسائ 8/284)

ऐ अल्लाह मैं उस इल्म से पनाह माँगता हूं जो फ़ायदा न पहुंचा सके, ऐसी दुआ से पनाह माँगता हूं जो सुनी न जा सके, ऐसे दिल से पनाह मांगता हूं जिसमें ख़ुशू न हो, और ऐसे नफ्स से पनाह मांगता हूं जो संतुष्ट न हो सके। ( नसई 8/284)

#_आमीन_या_अर्रहमर्राहिमीन